मिशनरी पुस्तकें और राजा राम मोहन राय: मिशनरी शिक्षा के मददगार?

सीएफएंड्रूज़ की किताब जो भारत में कथित पुनर्जागरण और उसके मिशनरी पहलुओं को बताती है, वह राजा राम मोहन राय के विषय में बहुत ही रोचक दृष्टिकोण प्रदान करती है। THE RENAISSANCE IN INDIA, ITS MISSIONARY ASPECT, जिसका उद्देश्य मिशनरी सर्कल में प्रयोग करने के लिए था और यह उस कथित ज्ञान के बारे में थी, जो ईसाई मिशनरी शिक्षा के बाद कथित रूप से पैदा हुआ।

सीएफएंड्रूज़ राजा राम मोहन राय से बहुत प्रभावित हैं और यह बता रहे हैं कि वह कैसे मिशनरी डफ और मिशनरी टीचर के साथ मिलकर कार्य कर रहे थे?

अब जानते हैं कि आखिर मिशनरी डफ कौन थे और उनका उद्देश्य क्या था? एक पुस्तक है ALEXANDER BUFF pioneer of MISSIONARY EDUCATION जिसे विलियम पैटन ने लिखा था। उसमें विस्तार से यह बताया है कि आखिर एलेग्जेंडर डफ क्या चाहता था? एलेग्जेंडर डफ का उद्देश्य क्या था? जब वह भारत आया था तो उसने देखा कि भारत में कई मिशनरी काम कर रही हैं। और ईसाई धर्म के प्रचार का कार्य कर रही हैं। मगर वह नहीं चाहता था कि उसका नाम भी उन मिशनरी में शामिल हो। इसलिए उसने कुछ नया रास्ता चुना।

डफ का मत था कि ईसाई शिक्षा को आधार बनाया जाए और वह हिन्दू धर्म को नष्ट करना चाहता था। जहां उसके दोस्त हिन्दुओं से सीधे उनका धर्म छोड़ने के लिए कहते थे तो वहीं उसका मत था कि हिन्दू धर्म को नीचे विस्फोट करके उड़ाया जाए। वह चाहता था कि वह एक सुरंग बनाए जो हिन्दू धर्म के दुर्ग को नीचे से विस्फोट से उड़ा दे!
यह पुस्तक बताती है कि कैसे राजा राम मोहन रॉय ने डफ की सहायता की।

इसी पुस्तक में पृष्ठ 72 पर लिखा है कि डफ को अपने कार्य के लिए कमरा नहीं मिल पा रहा था। इसी क्रम में उनकी भेंट राम मोहन रॉय से हुई। राम मोहन रॉय ने अपनी सभा को दूसरे स्थान पर स्थानांतरित किया और फिर कहा कि वह अपने मिशनरी स्कूल को उसी स्थान से आरम्भ कर सकते हैं।

राम मोहन राय ने खुद वहां के ब्राह्मण मालिक को किराया देकर सुनिश्चित किया। और वहां पर लटके हुए पंखे की ओर देखकर कहा कि “यह मैं अपनी विरासत के रूप में आपके पास छोड़कर जा रहा हूँ!”
फिर वह लिखते हैं कि राम मोहन राय ने केवल हॉल ही नहीं दिया बल्कि प्रथम शिष्य भी प्रदान किए। यह देखना बहुत ही यादगार है कि कैसे डफ ने “हिन्दू कलकत्ते” को यह स्पष्ट कर दिया कि वह किस प्रकार की शिक्षा देना चाहता है।
उसने बाइबल की शिक्षा को आगे रखा।

इतना ही नहीं इस पुस्तक में राम मोहन राय के उस पत्र का भी उल्लेख है जो उन्होंने अंग्रेजी सरकार को इसलिए लिखा था कि संस्कृत शिक्षा के विद्यालय न खोले जाएं! उनके पत्र में लिखा था कि

“हम पाते हैं कि भारत में पहले से मौजूद ज्ञान को प्रदान करने के लिए सरकार हिंदू पंडितों के अधीन एक संस्कृत विद्यालय की स्थापना कर रही है। इस विद्यालय (लॉर्ड बेकन के समय से पहले यूरोप में मौजूद लोगों के चरित्र के समान) से केवल युवाओं के दिमाग को व्याकरणिक बारीकियों और तात्विक भेद पाने की ही उम्मीद की जा सकती है, जिनका विद्यार्थियों या समाज के लिए बहुत कम या कोई व्यावहारिक उपयोग नहीं है। विद्यार्थी वह हासिल करेंगे जो दो हजार साल पहले जाना जाता था, एकदम बेकार, जिसे ठेकेदार लोगों द्वारा बनाया गया था, जैसा कि पहले से ही भारत के सभी हिस्सों में सिखाया जाता है”

इस पुस्तक में तमाम ऐसी बातें हैं जो यह बताती हैं कि राजा राम मोहन राय ने डफ के साथ मिलकर ईसाई शिक्षा के प्रचार पसार में योगदान दिया। डफ का पहला स्कूल राजा राम मोहन राय के सहयोग से आरम्भ हुआ। राजा राम मोहन राय ने अपने मित्रों को इस स्कूल के साथ जुड़ने के लिए प्रेरित किया। पांच युवा लोग गए और फिर डफ ने उन्हें अपनी योजनाओं के विषय में बताया।

स्कूल को 13 जून 1830 को सुबह 10 बजे खोला गया और राजा ने हर समस्या के समाधान का आश्वासन दिया।
डफ ने पहला सत्र बंगाली में लार्ड की प्रेयर के साथ शुरू किया और जिसमें राजा राम मिहन रिय और विद्यार्थी खड़े हुए।
फिर उनके हाथों में गोस्पल की एक प्रति दी गयी और छात्रों से पढने के लिए कहा। जब कुछ विद्यार्थियों ने इसका विरोध किया, तो राजा राम मोहन राय ने समझाया कि यह केवल एक किताब है, इसे पढने से कोई ईसाई नहीं हो जाएगा!
इस पुस्तक में यह भी कहा गया है कि राजा राम मोहन राय एक ईसाई के रूप में मरे थे।

जो व्यक्ति हिन्दू धर्म के दुर्ग को ईसाई शिक्षा की सुरंग के माध्यम से विस्फोट से उड़ाना चाहता था, उसे राजा राम मोहन राय द्वारा इतनी सहायता देना, बहुत कुछ प्रश्न उठाता है। और यह भी प्रश्न उठते हैं कि वह कौन से सुधार थे, जिनके विषय में मिशनरी इस सीमा तक प्रभावित हैं?
राजा राम मोहन राय के जन्मदिन अर्थात 22 मई पर जब उन्हें सुधारक की संज्ञा दी जा रही है, तो फिर डफ के साथ संबंधों पर भी बात होनी चाहिए!

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