डेस्डीमोना मरती नहीं

और वह चली गयी, क्या मैंने उसे रोकने की कोशिश की? क्या मैं उसे रोक सकती थी? शायद नहीं, पर वह थी कौन? एक चरित्र ही तो थी! जो किताब से निकल कर मेरे जीवन को एकदम तहसनहस कर गयी थी। वह ओस की पहली बूँद के जैसी निच्छल थी, पति के प्रेम का शिकार थी। और पति के प्रेम का शिकार न भी थी तो वह एक कालखंड का शिकार थी। वह शायद कुलीनता और सभ्यता के  सामंतवादी  विचारों का शिकार थी। वो तमाम पाखंडो से न बच सकी एक औरत थी, जो आज हर घर में मिल जाएगी।

कल की रात नींद नहीं आ रही थी। और  मैं सोच रही थी:

“ये नींद भी भारतीय क्रिकेट टीम हो चली है, चली तो  पूरी  टीम चली नहीं तो कोई नहीं। या फिर नौ माह के गर्भ जैसी, जिसका पता ही न चले कि अब दर्द, अब दर्द और दर्द का नामोनिशान  नहीं। ये नींद  तो आती ही है और न जाती ही है। उनींदा सा हर क्षण रहता है।“

रात में ही सामने वाले फ्लैट से फिर लड़ाई की आवाजें आ रही थी। मैं डेस्डीमोना को पढ़ते पढ़ते घर से बाहर आ गयी थी।

ये शेक्सपियर भी न, खुद तो चले गए और हमारे पास छोड़ गए हमारे जीवन में समाते हुए चरित्र।

वाह, क्या क्या न कहते हैं, जियो शेक्सपियर जियो। डेस्डीमोना मुझे आकर्षित करती है हमेशा। हर घर से एक डेस्डीमोना झांकती है, वह ज़िंदा सी है, लगभग हर घर की खिड़की से झांकती है। और जैसे इशारा सा करती है। अपने अस्तित्व को न भूलने के लिए हमें जिद्द करती है। पर अभी तो सामने वाले घर से ही आवाजें आ रही थी। मेरा मन हो रहा था कि काश मेरे पास उड़ने वाली झाडू होती चुड़ैल वाली, तो मैं भी चली जाती उड़कर, उस घर में। हैरी पॉटर में जैसे हम चुड़ैल देखते थे, पर वह झाडू मेरे पास नहीं है और मैं अभी अपने घर की बालकनी में खडी होकर डेस्डीमोना को महसूस कर रही हूँ और बीच बीच में सामने वाले घर से आती हुई आवाजों को सुन रही थी, वह भी मुझे अपनी तरफ खींच रही थी, मन में तो बहुत आया कि चली जाऊं! पर रात के बारह बज चुके थे, और कॉलोनी का गार्ड मुझे बार बार घर के अंदर जाने के लिए कह रहा था,

“मैडम, इश  शमय प्लीश घर में जाओ न!, हमारे गावों में कहते हैं, कि चुड़ैल पड़ जाती है पीछे 12 बजे के बाद!”

“अच्छा, अगर चुड़ैल पीछे पड़ जाती है तो तुम्हारे पीछे क्यों नहीं पड़ती? तुम तो रोज ही बाहर रात को 12 बजे से 5 बजे तक रहते हो?”

“ओ, मैडम जी, मैं तो आदमी हूं, चुड़ैल न औरतों के पीछे ही लगती है, हम तो वैसे भी आदमी है। हमारे पीछे आएगा तो पिटेगा नहीं”

“तुम चुड़ैल को मारोगे?”

“ओ मैडम जी, औरत जब सुनती नहीं बात तो पिटती ही है न!”

“हां, वैसे……………..।”

उसने इधर उधर देखा और फुसफुसाया

“मैडम जी, औरत तो औरत है,क्या जिंदा क्या मरी? जब जिंदा न बिगाड़ पाती है कुछ, तो मर कर क्या बिगाड़ेगी”

“तुम लोग औरतों के लिए बहुत ही नियम कायदे बनाते हो?”

“अब छोड़िये मैडम जी, आपने देखा नहीं कैसे सामने वाले घर से चीख की आवाजें आ रही हैं, आप देखिये, अब अगर दिन भर का थका हारा मरद आएगा तो जरा  हाथ पैर दबा देने में क्या बुराई? जरा दो चार हाथ खा लेगी तो क्या हो जाएगा? अब वैसे भी दिन भर बैठकर खा खा कर मोटी ही तो होती रहती हैं, लुगाइयां”

“अच्छा अच्छा जाओ तुम!” मेरी रूचि उसके हिसाब से उसका नारीपुराण सुनने में नहीं थी। एक तो मैं डेस्डीमोना को पढ़ रही थी और दूसरा मैं सामने वाले घर से आने वाली आवाजें सुनना चाह रही थी, रात को साढ़े बारह बजे किसी के घर में तो जा नहीं सकते पर सुन तो सकते हैं

“मैडम जी, जा तो रहा हूं, पर ध्यान रखना चुडैलें आदमियों से डरती हैं, औरतों को ही अपने कब्ज़े में करती हैं। आप जाओ अंदर!”

“ठीक है, अब तुम जाओ”

उसके चुड़ैल पुराण के बाद मैं फिर से आ गयी थी। मैं अंगद के पैर की तरह एक ही तरह जैसे जड़ सी हो गयी थी, पर वह है कि मान नहीं रहा था।

सामने से आवाजें और तेज होती जा रही थीं

“अरे, दुष्ट, एकदम वैश्या हो तुम, you are such a whore, such  a prostitute,”

चटाक, चटाक की आवाज़!

लग रहा है, गृहयुद्ध हो रहा है, गृहयुद्ध कैसे? युद्ध में तो दो तरफा वार होते हैं, पर यहाँ पर तो शायद एक ही ओर से वार हो रहा है, जैसे डेस्डीमोना झेलती थी, अपने पति के वार। ओथेलो भी तो इसी आदमी की तरह अपनी पत्नी को मारता था, तो वो क्या करती होगी? शेक्सपियर को अगर हटा भी दूं तो डेस्डीमोना अगर इस औरत की तरह होती तो शायद वह अपना गाउन उठाकर अपने घुटनों के बल अपने पति के पैरों में बैठकर उससे क्षमा मांगती, जो शायद वह मांगती थी, वह उसे पापी, परपुरुष गामी कहता होगा और वह क्या रोकर ही केवल उसे अपनी तकदीर मान लेती होगी, पर ऐसा ही तो सीता ने भी किया था।

हो सकता है कि राम ने खुद सीता के चरित्र पर शक नहीं किया हो, पर उन्होंने सीता को केवल चरित्र की ही परिभाषा के कारण जंगलों के हवाले कर दिया था। तो ऐसे में भला इस पुरुष की क्या बिसात? ये तो वही कर रहा है जो इसने देखा है। मैं भी न जाने अपने घर की बालकनी में खड़े खड़े रात को बारह बजे किन हवाओं में खो रही थी, एक हवा मुझे डेस्डीमोना  की ओर लेकर जा रही थी तो दूसरी हवा मुझे हर उस स्त्री की ओर लेकर जा रही थी जो शक का शिकार होती है। ये डेस्डीमोना, फिर से आ गयी कमबख्त, मुझे हंसी भी आ रही है, वह मेरी रूह में अन्दर तक समाई हुई है, वह मुझे कभी आकर अचंभित भी करती है, जैसे ही सामने वाले फ्लैट से किसी भी स्त्री के रोने की आवाज़ आती है वह मुझे उसी खिड़की पर आकर जैसे आवाज़ देती है, बोलती है “देखो, मैं आ गयी, इस बार मोटा गाउन नहीं पहने हूँ, इस बार मैं तुम्हारे यूपी और बिहार में जाकर देखो साड़ी पहनकर आ गयी हूँ, पर सुनो केवल चोला ही बदला है, मेरादर्द तो अभी भी वही ही है और उसी तरह का है जब ओथेलो मुझे मेरे पिता के घर से लाते समय तो प्रेम से लाता है पर मुझ पर अधिकार के बाद वह मुझ पर छोटी छोटी बातों पर शक करता हुआ, मुझे ही मारने को सहर्ष तैयार हो जाता है। शादी के बाद तो सुना है भरोसा जम जाता है, पर मेरे मामले में उसने क्यों अपने दोस्त पर भरोसा किया? तुम तो पढ़ रही हो न मुझे?, कुछ बोलती क्यों नहीं?”

वह पागल होकर चीख रही थी, मैं क्या करती? अब उसके लेखक ने ही उसके पति से उसे मरवा दिया तो मैं क्या कर सकती थी? अगर मैं लिखूँगी तो कोई डेस्डीमोना तो मैं उसके पति को दोषी ठहराऊँगी, पर क्या ऐसा संभव है? सामने वाला घर भी तो अपनी बीवी को मारने के लिए दोषी है पर क्या फायदा हो रहा है? नहीं, वह भी तो खूब गालियां दे रहा है। समय बदलने के बाद भी मैं नई डेस्डीमोना बनने से भी नहीं रोक सकती हूँ। मैं रोकना चाहती हूँ। बात करना चाहती हूँ, पर कैसे करूं? उफ,

मैं एक पल को रुक गई, अब मेरी हंसी गायब हो गयी है, अब डेस्डीमोना छाने लगी है, जैसे भूत या आत्माएं किसी भी काया में प्रवेश करती हैं वैसे ही वह मुझमें प्रवेश कर रही है, मैं वह और वह मैं बनने सी लगी है, तभी मैं एकदम से किताब अपने हाथ से फ़ेंक देती हूँ, वह किताब में से झाँक कर कहती है,

“क्या तुम कभी डेस्डीमोना होने से बच पाओगी और कब तक बचोगी?”

न जाने क्यों वह एकदम से हिंसक हो गयी। खिड़की से आवाजें भी तेज हो गईं और मेरे ज़ेहन में जहां डेस्डीमोना का “मेरे स्वामी, मुझे माफ करो कहना” भी जहां तेज होता जा रहा है वहीं उस औरत का “माफ कर दो, मुझे माफ कर दो।”

मैं अब क्या करूं। दो कालखंडों के एक ही दर्द को कैसे खुद में भरूं?

उफ, ये हिंसक हंसी! मैं दोनों ही तरफ से फांसी पा रही हूँ, अब मेरी आवाज़ घुट रही है, पर ये दोनों, ये दोनों तो जैसे जंगली बिल्ली की तरह लडती ही जा रही हैं, एक ओर वह खिड़की के अन्दर से

“माफ कर दो, अब बात नहीं करूंगी, अब मैं नहीं झाकूंगी, अब माफ करो”  बोलती जा रही है, और दूसरी ओर किताब के अन्दर से वह भी बोल रही है, अपने चरित्र पर शक करते हुए अपने पति ओथेलो को एक अजीब सी निगाह से देख रही है, वह एक अविश्वास से देख रही है। आखिर क्यों उसके पति को उस पर भरोसा नहीं है और क्यों भरोसा खो रहा है?

“औरत पर भरोसा क्यों नहीं करता आदमी?” अचानक से उसने मुझसे पूछा था,

“ओह, पता नहीं”

मैं उसकी इस हिंसा से डर गयी थी और इतना डरी कि मैंने सोचा कि किताब को उठाकर मैं उसे नाली में फ़ेंक दूं।

“ठीक है, शेक्सपियर जी, इतना खूबसूरत नाटक लिखे पर ऐसा भी नहीं कि वह पाठक का ही सर्वनाश कर दे। अब देखिये ये कैसे सर पर नाच रही है और अपन को भी नचाए हुए हैं।”

उधर गार्ड कह रहा है “मैडम, अभी कोई चोर घुस आएगा, आप प्लीश घर में जाएं”

मुझे वह किताब के अन्दर से जीभ चिढा रही है, मैंने उससे कहा भी

“नहीं, अब अविश्वास से होने वाली हिंसा काफी कम हुई है। अब पति अपनी पत्नी पर फालतू में शक नहीं करता” और यह कहकर मैंने अपना सिर नीचे कर लिया, मैं इससे ज्यादा झूठ नहीं बोल सकती थी। तभी मैंने देखा कि इस बात पर वह अपना पेट पकड़ कर हंस रही है, मुझे बोलने का मौक़ा तो दे ही नहीं रही है, अब मेरे पति के खर्राटे भी दीवार तोड़कर बाहर आने लगे है। मुझे हंसी आई, और बहुत ही आश्चर्य हुआ कि अरे, देखो ये मर्द लोग कैसे सो लेते हैं, बेझिझक! एकदम बिना किसी परेशानी के। इन्हें मतलब नहीं होता कि घर के सामने कोई किसी को पीट रहा है, कोई मरे, जिए इन्हें मतलब ही नहीं। इन्हें मतलब नहीं होता कि घर के सामने कोई हिंसा का शिकार हो रहा है या फिर कोई प्रतिहिंसा का शिकार हो रहा है। उफ!

हां, तो किताब से फिर से झांकती है और मुझसे बात करती है मेरी डेस्डीमोना , अब मुझे वह बहुत ही टूटी हुई कातर सी दिखती है, जो मुझे आजकल लगभग हर ही स्त्री लगती है। कोई किसी भी तरह से टूटी है तो कोई किसी। पर हां, सब में एक बात कॉमन है कि उनके अस्तित्व को नज़रंदाज़ करने की हिंसा हो रही है। जैसे राम आदर्श पुरुष है, आदर्श बेटे हैं, आदर्श भाई हैं, आदर्श राजा हैं, पर पत्नी के अस्तित्व को नज़रन्दाज़ कर वे आदर्श पति न बन पाए। ऐसा क्यों होता है कि स्त्री का अस्तित्व दबाने की एक हिंसा होती है, जो हमारे सामने होते हुए भी हमें नज़र नहीं आती। कितना अजीब होता है कि एक पुरुष के लिए हर किसी का अस्तित्व महत्वपूर्ण होता है, हर किसी को वह महत्व देता है, पर वह केवल अपने जीवन से जुड़ी हुई सबसे महत्वपूर्ण स्त्री अर्थात पत्नी को ही महत्व नहीं देता, वह उसके अंगों पर अधिकार जमाना चाहता है, उसे चादर बनाकर ओढ़ना चाहता है, उसे बिस्तर की तरह बिछाता है पर न जाने क्यों एक नौकर की तरह उसके अस्तित्व को नकारता रहता है। 

सच है शायद डेस्डीमोना  इसी हिंसा का शिकार हुई थी, या वह किसी छल का शिकार हुई थी, पर छल कोई भी हो, हारी तो एक पत्नी ही। वह जंघा की परिधि में होने वाले युद्ध में पराजित होने वाली प्रजाति हो जाती है, हां एक पत्नी के रूप में स्त्री शायद जंघा की परिधि वाले युद्ध हारती है औरत, तभी तो छली जाती है। नहीं नहीं वह जंघा की परिधि का युद्ध नहीं होता, शायद जंघा की परिधि पर वर्चस्व कायम करने वाला युद्ध होता है। वह निरंतर संघर्ष होता है। वह चरित्र का संघर्ष है, वह तथाकथित मर्यादा का चरित्र है। एक पत्नी के रूप में स्त्री निरंतर संघर्ष रत है, वह जूझती है, पर शायद इस स्थान के वर्चस्व के युद्ध को हार जाती है।

मेरे घर के सामने की खिड़की में वाकयुद्ध अब शांत होने लगा था, वह क्यों शांत हो रहा था, ये तो नहीं पता, पर अब घर की लाइटें बंद हो गयी थी, और जोर जोर से जो चीखें आ रही थी, शायद अब दबी सिस्कारियों में बदल गयी होंगी। अब शायद उस वर्चस्व का समय आ गया होगा जिसके कारण यह पूरा युद्ध हो रहा था। अब शायद वर्चस्व की चाह में उसकी देह को मसला जा रहा होगा या मसाला लगाकर मुक्त रूप से वह भोग लगा रहा होगा।

पर उसकी चीखों से मेरी नींद तो गायब हो चुकी थी, और रात की चादर और स्याह हो चुकी थी। मुझे तो नींद तो आ नहीं रही, पर घर के सामने वाली औरत क्या करेगी?  सो जाएगी या अपने स्वामी को भोग लगाने के बाद जागकर मेरे साथ मेरी डेस्डीमोना  के साथ आएगी? शायद सो ही जाएगी, अपने मर्द को ओढ़ कर, ऐसी कायर औरतें अपने मर्द को ओढ़कर सोने में ही भरोसा करती हैं, वे जागती नहीं, वे सोती रहती हैं, नींद उनकी केवल तभी टूटती है जब उनके जीवन पर संकट आता है, जैसे डेस्डीमोना  की भी तन्द्रा तभी टूटी थी न जब उसे उसका पति मारने आया होगा, या उसे लगा होगा अब यह मेरे प्राण ले लेगा। ये रात के समय शोर मचाने वाली स्त्रियाँ ऐसे ही किसी समय जागती हैं, या तो जब उनके प्राण ही संकट में आते हैं या फिर तब जब उनपर कोई बाहर से लाकर बैठा दी जाती है, नहीं तो तब तक वे अपने पतियों को ही ओढ़कर सोने में दुनिया का सबसे बड़ा सुख मानती हैं।

अब तक मेरी भी आँखों में नींद आने लगी थी, डेस्डीमोना  ने कहा सोने जा रही हो, मैंने कहा “हां, पर तुम्हारे साथ बात भी करने का मन है”।

उसने कुछ अचरज से पूछा ”अच्छा एक बात तो बताओ?”

“हां, बोलो”

“हम घर से भागी लड़कियों की गलती क्या होती है?”

“ओह, ये तो बहुत अच्छा सवाल पूछा तुमने!”

उसने इधर उधर देखा, फिर कान में फुसफुसाया

“तुम्हें पता, जैसे ही लड़की घर से भागती है, वह चरित्रहीन साबित हो जाती है, है न!”

“हां, ऐसा ही है!”

“पर क्यों”

“पता नहीं”

“मैं अपने पिता की लाड़ली, एक रोमांचक सफर पर जीवन जीने वाली, मैं, अपने जीवन का एक एक क्षण जीने वाली, अपने पिता और बाद में अपने पति को समर्पित आदर्श लड़की, चरित्रहीन हो गयी!”

वह मायूस लग रही थी.

“छोड़ो, ये किस्सा!”

“अच्छा एक बात बताओ, कभी तुमने ड्रिंक लिया है?”

“ड्रिंक! खुलकर केवल अपने से बात करते हुए, अपने आप से किस्से कहानी कहते हुए?”

“शायद नहीं!, ये तो अपवित्रता और चरित्रहीनता की निशानी है न?”

“अपवित्रता, चरित्रहीनता, तो क्या तुम्हारे प्रिय ओथेलो चरित्रहीन थे?, अपवित्र थे?”

“ओहो, ये परिभाषाएं तो औरतों तक ही हैं न!”

“तुम ये सब मानती हो?”

“क्या मेरे न मानने से सच बदल जाएगा?”

“अच्छा सुनो, तुम्हें क्या लगता है कि सामने वाले घर में लड़ाई क्यों हो रही होगी? अगर तुम होती तो क्या होता?”

“तुम्हारे पति सो जाते हैं न समय से, इसलिए तुम इतना बोल पाती हो! नहीं तो अभी तुम भी यहीं होतीं?”

मैं सिमट गयी खुद में! खर्राटे बाहर तक आ रहे थे, पर मैं कैसे उसे बताती कि कुछ हिंसा तो मैं भी झेलती हूं. वैश्या का ताना तो मैं भी खाती हूं, और क्यों? उसे क्या बताऊं? अभी कल ही तो जम कर बहस हुई थी व्हाट्सएप पर, कि वैश्या कम से कम पैसे के बदले शरीर तो देती है, बीवी तो वैश्या से भी गयी गुजरी होती हैं, घर चलाने का पैसा भी पति देता है और उसे बदले में कुछ नहीं मिलता. मिलते हैं तो बच्चों की फरमाइशें, ये ला दो, वो ला दो. और बीवी के नखरे. यू आर अटर फेल्योर! ओह, मैं सब कुछ याद करने के पक्ष में नहीं थी, मैंने उससे एक बार फिर आँखें चुराईं!

“तुम कुछ कह नहीं रही हो?”

“मैं क्या?”

“यही कि तुम्हें पति अच्छा मिला है, इसलिए तुम अपने पंखों को इतना फैला पाती हो?”

मैंने अपने हाथों को देखा, अपने सपनों की उड़ानों को देखा और फिर मेसेज बॉक्स में आए मेसेज को! उफ, मैं क्या थी? क्या मैं वह थी जो उसकी जुबान कह रही थी या मैं वह थी जो मेरे पति ने मुझसे कहा था या मैं वह थी जो न किसी ने देखा था और न महसूस किया था. कई बार मैं सोचती, हम औरतें कहाँ कुलीनता का शिकार होती रही हैं. हम औरतें हमेशा ही न जाने किस किस का विषय रही हैं, पर हाँ, सारा संघर्ष जंघा क्षेत्र पर वर्चस्व के लिए ही होता है. हम ऐसे समाज में कैसे जिंदा रहते हैं?

“क्या हुआ?” उसने कुरेदा

मैंने ख्यालों को परे झटकते हुए कहा “मैं तुमसे बात कर रही हूं और तुम मेरी ज़िन्दगी के बक्से को खंगाल रही हो? मेरे बक्से में तुम्हें कुछ नहीं दिखेगा?”

“क्यों वहां भी वही अँधेरा है जो मेरी ज़िन्दगी में था?”

वह अपनी ज़िन्दगी के बक्से को मेरे साथ क्यों मिला रही थी, मैं नहीं थी तैयार इसके लिए, मैं तो उसकी ज़िन्दगी में झांकना चाह रही थी कि आखिर उसके साथ ऐसा क्यों हुआ होगा? क्या दुनिया की हर जगह पर हर काल खंड में औरतों के साथ यही होता है कि चरित्र के आधार पर कभी घर से निकाला जाता है, कभी तलाक दिया जाता है. ऐसा क्यों?

पर शेक्सपियर ने ऐसा क्यों किया? इतनी प्यारी गोरी, सुंदर डेस्डीमोना को एक तो प्यार करा दिया काले से और फिर उस काले मूर से उस मक्खन मलाई पर संदेह का डाका डलवा दिया!

“अच्छा तुम बताओ?”

“क्या?” उसने पूछा

“तुम्हें उससे प्यार क्यों हुआ था?”

“ओथेलो से”

“हां! जबकि वह तुमसे तो हर लिहाज़ से कमतर ही था”

“ओह, ऐसा नहीं था!”

“मतलब?”

“वह काला था, और तुम एकदम मक्खन की लोई, वह शक्की था और तुम एकदम उसके लिए समर्पित, उसे तुम्हारे हाथ से खाना खाने में एतराज था पर तुम्हें तो उसके हाथों से मरने में भी कोई एतराज न हुआ. अच्छा वह तुम्हें मारना क्यों चाहता था?”

“अरे, ये मुझे क्या पता? मैं तो अपने मालिक की बांहों में बहुत खुश थी. उसने मुझे क्यों मारना चाहा, पता नहीं!”

“फिर भी?”

“तुम्हें पता?” उसका चेहरा खिला और मुझे लगा कि वह बहुत कुछ बताएगी.

“हां, कहो!”

“तुम्हें पता मैंने जब अपनी मर्जी से शादी का फैसला किया था तो सोचा था कि एक बहादुर आदमी की बाहों में पिघल जाऊंगी और जब एक नया संसार हमारे सामने आएगा तो हम कितना कुछ रचेंगे. कितना सुंदर होगा. हमारे बच्चे इस रंगभेद की दुनिया में एक नयी मिसाल बनेंगे! पर!”

“पर, ये कुछ नहीं हो सका न? अरे छोड़ो यार ये दुनिया, मर्दों की है. हमने उन्हें जन्म दिया, उन्हें अपना रक्षक कहा, पति और प्रेमी के रूप में अपना शरीर दिया. और उन्होंने हमें हर समय मारा, हर कालखंड में मारा”

“हां, पर मैं आज किताबों से झाँक कर हर किसी से पूछती हूं कि मेरा कसूर क्या था? मेरे महान लेखक ने न जाने कितने महान ग्रन्थ लिखे, कितने नाटक लिखे, उन्होंने अपने नायक को महान बनाने के लिए मुझपर ऐसा अत्याचार क्यों किया? पूरे नाटक में मैंने त्याग किया, अपने पिता के घर पर सबसे दुलारी मैं, जब पिता को पता चला कि मैं ओथेलो के साथ भाग आई तो उन्होंने कहा कि उसने मुझपर काला जादू कर दिया है. मैं अपने पिता के सामने मुंह न खोलने वाली लड़की, कैसे एक काले के साथ भाग सकती हूं.”

“सच ही तो है, हम अपने घर में पिता के सामने मुंह नहीं खोलती, जिसके साथ पली बढ़ी होती हैं, माने अपना भाई वह भी मालिक बन जाता है, और पर्दों की तहों के बीच अगर किसी से प्यार हो जाए, तो शादी के बाद वह एकदम मालिक बन जाता है. बिस्तर से लेकर कब्र तक वह हर क्षण हमारा मालिक बना रहता है.”

“सच कह रही हो और हम गुलामों की बात भी कभी सुनी जाती है. मैं अपने मालिक के सामने अपनी जान की भीख मांगती रही, मैं उससे बोलती रही मुझे न मारे, कम से कम मेरी गलती तो बताए, पर उस पर तो एक रूमाल के कारण इतना शक का काला रंग भर गया था कि वह मेरी मासूम और सफेद आँखों पर उसे बिलकुल भी भरोसा न हुआ. शायद आदमी ऐसे ही होते हैं?”

“हां, शायद वह समय ही ऐसा था कि तुम पर शक करने के बाद तुम्हें मारकर खुद को मारकर नायक महान बनता, उसकी महानता के किस्से गाए जाते, ओह, बेचारा षड्यंत्र का शिकार हो गया. वह समय ही अलग था! औरतों को मरना ही था, क्या करती जीकर? एक तो पति शक कर रहा था और दूसरा अगर वह मर जाता तो तुम्हारा क्या होता? क्या तुम दूसरी शादी करती?”

“ओह, दूसरी शादी?”

“पर मैंने तो तन मन और वचन सबसे केवल अपने स्वामी को ही प्यार किया था”

“पति स्वामी होता है?”

“हां, तुमने पढ़ा नहीं क्या कि मरते समय मैंने उससे क्या कहा था”

“हां, पढ़ा था, तुम माई लार्ड लार्ड कह कह कर अपनी जान की भीख मांग रही थी, यहाँ तक कि तुमने उससे कुछ घंटों तक जिंदा रहने और अपनी बेगुनाही साबित करने की मांग की थी. सच में यहाँ पर शेक्सपियर अन्याय कर गया तुम्हारे साथ, कम से कम तुम्हारे पति को तुम्हारे मुंह से बेगुनाही तो सुनवा देता?”

“हां, चलो पर अब क्या हो सकता है? मुझे जाना पड़ा! पर आज भी हालात कहाँ बदले हैं, तुमने देखा न, तुम्हारे सामने वाले घर में क्या हुआ?”

“हां, पागल लड़की थी, सरेंडर कर दिया, अब देखो सुबह कैसी आएगी. जैसे कुछ हुआ ही न हो! ये हम औरतें दर्द छिपाना कितना अच्छा जानती हैं?”

“हां, अच्छा तुम ड्रिंक करती हो?”

“हां, तुम पियोगी? मैं चली वाइन लेने!”

“मैं नहीं पियूंगी, आदत नहीं!”

“ओह, यू ऑर्थोडॉक्स गर्ल”

मैंने अन्दर जाकर एक ग्लास में अपने लिए वाइन लिया और फिर उसके पास आई। उस समय जैसे उसकी आँखों में मैं एक इतिहास की औरतों के साथ होते हुए अन्याय की एक तस्वीर देखी. वो क्या कहना चाह रही होगी. आसमान में बादल छा रहे थे और अब बिजली भी लुकाछिपी करने लगी थी. पता नहीं वह बिजली देखकर सहम रही थी. और उसका मन भी मेरी तरह भीगने का हो रहा था.

“देखो, बारिश”

“हां,”

“सुनो!” वह बोली

“मैं तो मर चुकी, मर जाने दो, पर तुम तो जियो, आज का लेखक तो शेक्सपियर जैसा नहीं न कि वह तुम्हें मारे, ये जो बूंदें हैं, उन्हें गिर जाने दो खुद पर खो जाओ तुम भी”

“हां, मैं वाइन पियूंगी”

“तुम पियो, मैं अपने जैसी बदशक्ल मुर्दाओं को धोकर ताजा करूंगी, मैं क्यों मरूं?”

मैंने उसकी आँखों के नीचे काले घेरों को सुनहरा होते देखा, वे वैसे ही सुनहरे हो रहे थे जैसे एक दिन मेरे विद्रोह के बाद मेरी आँखों के नीचे सुनहरी रोशनी छा गयी थी.

“मैं धर्म की चरखी से मुक्त होना चाहती हूं” वह अपने नीले गाउन को निचोड़ते हुए बोली

“मैं भी” मैंने कहा “तुम्हें पता इस चरखी में ही हमें बांधा जाता है, कि तुम धार्मिक बनो, धर्म के अनुसार बनो।  पर हमारे धर्म में जो हमारे लिए कहा गया है, उसे हमारे सामने ही तोड़मरोड़ कर हमारी थाली में बचपन से परोसा जाता है, धर्म में हमारे पक्ष में क्या कहा गया है, क्या उसे बताया जाता है? बस हमें केवल पुरुषों के हिसाब से तोड़मरोड़ कर परम्पराओं का तडका लगा प्रसाद दिया जाता है और हमें उसे नाश्ते, खाने और रात के खाने में खूब मिला मिला कर पिलाया जाता है।  कि हम कहीं भाग न जाएँ, बिगड़ न जाएँ। घुट्टी बनाकर पिला दिया जाता है. सब कुछ एक काढ़े की तरह”

“हां, पर अब मुझे आज़ाद होना है!” वह अपने गाउन का निचला हिस्सा हटाती जा रही थी, उसका नीचे जमीन छूता गाउन अब घुटने तक रह गया था.

“मैं दो बार मारी गयी, एक बार स्लो डेथ मरी, और एक बार तलवार से मारी गयी, पर तलवार से मारा जाना बहुत सहज रहा, क्योंकि उसमें मुझे पता था कि क्या होने वाला था, स्लो डेथ मुझे नीला कर रही थी, हर अंग नीला हो गया था, एकदम जहर से भरा” वो फिर वही हिंसक हंसी पर उतर आई. अब मैं उसकी आँखों में गुस्से और नफरत के भावों को देख रही थी. वह पानी को अपनी आँखों से पी रही थी,

“हर तरफ आग, शक की आग, हर तरफ खंजर, शक का खंजर, मेरे स्वामी, मेरे स्वामी, और स्वामी का मुझे वैश्या कहना,  हर तरफ कोई आवाज़ नहीं, बस केवल शक का कोहरा, शक की चादर, और उस चादर के अन्दर हर क्षण घुटती मैं, और मेरे मरने पर महानता का लबादा ओढ़े मेरे नायक, मेरा लेखक” वह हिंसक हो गयी, और पागलों की तरह नाचने लगी वह आधी गायब हो रही थी, केवल उसका शरीर मुझे दिख रहा था, उसके पैर गायब हो गए थे, वह कठपुतली जैसी दिख रही थी.

अरे, हम औरतें तो हर युग में कठपुतली ही रही हैं, मैं उसके पैर खोज रही थी. मन बोला क्या करेंगी हम औरतें पैर लेकर, अपने मन से दो कदम तो चल नहीं सकती, पैर का क्या होगा? हंस सब कठपुतली ही तो हैं, वह कठपुतली थी अपने लेखक की, जो लेखक ने कहा, वह उसने कहा, उसने किया, खड़ी हो गयी तलवार के सामने. ओह, बूंदे, अचानक से मुझे वे बूँदें तेज़ाब की बूँदें लगने लगी, जो उसे जला रही थी, उसका एक एक अंग जैसे गल गल कर बूंदों के साथ बहने लगा. ओह, मैं क्या करूँ? मैं उसे कैसे बचाऊं? उन बूंदों पर मेरा कोई बस नहीं चल रहा था, ओह, वह गल गल कर बह रही थी और बह रही थी कुलीनता में तराशी हुई हम औरतों की कहानियां, चरित्रहीनता के आरोप में घर छोड़कर जाती गर्भवती सीता, पांच पतियों के बावजूद अपने चरित्र की हिफाजत के लिए कृष्ण को पुकारती हुई द्रौपदी, गुलाम से प्यार करने के एवज में अपनी जान की कीमत चुकाने वाली रजिया सुल्ताना, या अभी सामने वाली औरत जो “prostitute” की उपाधि पा रही थी, और मैं खुद और मेरी यह नायिका, सब एक एक बूँद बनकर गल गल कर मेरी आँखों के सामने बह रही हैं.

मेरी छोटी सी बालकनी एकदम से जैसे एक समंदर में बदल गयी, बादल गरज रहे थे, बिजली   भी  तांडव कर रही है और यह जैसे समंदर मेरे वाइन के गिलास से होकर मेरे अन्दर जा रहा है, मैं उस दर्द के समंदर को पी रही हूं.

“नहीं नहीं, जाओ यहाँ से, मैं बर्दाश्त नहीं  कर पा रही हूँ”

“माँ, बारिश हो रही है, आप चीख क्यों रही हैं?” मेरा आठ साल का बेटा मेरा पजामा थामे खड़ा है बालकनी में, बारिश से आसमान धुल चुका है, और मैं क्या कर रही हूं, वहीं खड़ी हूँ. ओह, मैं उन लम्हों को याद कर रही हूं, वो क्या थी. सामने वाले घर की खिड़की भी शांत है तो क्या वह सब सपना था? नहीं इतना जीवंत सपना नहीं हो सकता! अभी अभी तो मेरे साथ थी, हम लोग उसकी ज़िन्दगी को जी रहे थे!

मेरे कानों में अचानक से फुसफुसाहट होती है “मैं कहां जाऊंगी, यहीं रहूँगी, हर औरत में, तुम में, उस सामने वाली में, क्योंकि न तो औरत बदली है और न ही पुरुष की आदतें! तुम्हारा पति जब तुम्हें वैश्या बोलेगा तब तुम नहीं हर औरत गाली खाएगी, पर सुनो अब समय बदलना चाहिए, है न!, कोई कोना होना चाहिए न हमारे हंसने रोने के लिए. और हर ऑनर किलिंग के लिए प्रश्न तो उठना ही चाहिए. हमें आज़ादी  तो चाहिए ही होगी”

रात का दो बज चुका था. मैंने भी उसके कान में कहा

“हां, एक कोना तो होगा. सुनो, तुम्हें गढ़ा गया था घोर सामंतवादी युग में, जहां स्त्रियों का पुरुष की मर्जी के बिना सांस लेना भी गुनाह माना जाता था, और तुम अपने लेखक से उम्मीद करती हो तुम्हारे लिए कोई कोना खोजता। पुरुष तो नख शिख तक हम पर अधिकार मानता है। और जैसे ही वह स्वतंत्र औरत गढ़ने लगेगा वैसे ही वह अपनी सत्ता के लिए एक प्रतिद्वंदी न पैदा कर लेगा? उसे बंद कमरे में गहनों से पगी हुई औरत चाहिए, इतने गहने कि वह उनमें ही दब कर रह जाए”

“हां,” अब वह अद्रश्य रहकर बात कर रही थी.  

“और तुम्हारा लेखक, कैसे कोई ऐसी औरत गढ़ सकता था जो स्वतंत्र हो, जो कमाए, जो अपने पति के सामने मुंह खोलने का साहस करे। अरे वह न तो वह खुद ही ऐसा करता और न ही उसे कोई यह करने देता, तुम्हें पता उसे शायद ज़िंदा ही जला दिया जाता। चूंकि उसे अपनी जान से प्रेम था और तुमसे भी, तभी तो तुममे इतनी खूबियाँ डाली, कि आज तक तुमसे प्रेम है और तुम्हारे कारण तुम्हारे लेखक से हम प्रेम करते हैं। पर है तो वह सामंतवादी और पुरुष ही न!, तुमसे गलबहियां तो नहीं कर सकता न!, तुम्हें त्याग के रूप में ही अमर बना सकता था, पर स्वतंत्र नायिका के रूप में नहीं। समझो”

वह भी आंसू पोंछती हुई बोली “हां, ये सच है तब मैं शिकार हुई शक की, जांघ के वर्चस्व के संघर्ष की, पर अब जानती हूँ अब अगर गढ़ी जाऊंगी, तो तुम्हारे ही जैसी किसी भी स्त्री के हाथों, जो इस वर्चस्व में मेरा भी योगदान बताएगी। मैं अब शक के कारण मारी न जाऊं, इस बात का ख्याल रखना, अच्छा चलूँ, सुबह होने को है”

सुबह की पहली निशानी यानि आसमान पर हल्की गुलाबी रंगत छाने लगी थी, और डेस्डीमोना  किताब में पन्नों में समा गई, मैंने उससे कहा “वादा करती हूँ, अब कोई डेस्डीमोना  किसी भी कहानी में शक की बिनाह पर मारी न जाएगी, अब डेस्डीमोना  की आँखों पर काले घेरे न होंगे और अब डेस्डीमोना  के साथ वैश्या के शब्द न होंगे, क्योंकि अब डेस्डीमोना  का सृजन शायद किसी और नजरिए से होगा, अब स्त्री शायद डेस्डीमोना  को गढ़ेगी, अब डेस्डीमोना  कहानियों में चरित्र की बलि न चढ़ेगी, विदा डेस्डीमोना”

सामने के घर में हलचल होने लगी थी, और सूजी आँखों के साथ एक नई डेस्डीमोना  शायद जन्म लेने लगी थी, वह क्या करेगी? ये पता नहीं………………………….

शायद जीना तो डेस्डीमोना को खुद ही है, हाँ, कहानियों में उसे जिंदा रखने का जिम्मा मेरा है, पर खुद का जीवन जीना, ये तो हर डेस्डीमोना  पर ही निर्भर है। हाँ विदा डेस्डीमोना, फिर मिलना कहीं किसी मोड़ पर,

विदा डेस्डीमोना, तुम आकर समय समय पर मुझे और सबको बताती रहना कि स्त्री चरित्र को सामंतवादी रचेगा तो क्या करेगा और अगर मैं कभी रच पाई? पता  नहीं ये भविष्य के गर्भ में, अभी के लिए जाओ, बहुत तुम अकेली हो, तुम्हारे दर्द में तुम्हारे साथ मैं भी नहीं……………………

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